दिल्ली के नेहरू पार्क में मैं लेटा हुआ था. कब, क्यों और कैसे जाके लेट गया, पता नहीं. पेड़ों पर बैठे-उड़ते पक्षियों को देख रहा था. एकाएक काले बादल चारो तरफ छा गए. तेज बारिश से बचने के लिए कई लोग इधर-उधर भागने लगे. एक लड़की दिखी. उसका चेहरा बालों से ढका हुआ था. वह भागनेवालों में शामिल नहीं थी. वह हरे-भरे घास पर बैठी थी. आसमान को देख रही थी और हवा खा रही थी. हवाओं ने बालों को सुंदर चेहरे से दूर कर दिया. एकदम गोरी लेकिन अकेली. उसकी सूरत देखते ही मैं गाना गाने लगा.गोरे-गोरे चाँद से मुख पर काली काली आँखें हैंमैं गीत गाता रहा और उसे देखता रहा कि अचानक वह लड़की चलकर मेरे पास आ गई. उसके आते ही मेरे दिल की धड़कन बढ़ गई. और झट से नींद से खुल गई. बगल में परेशान मम्मी मेरे दिल की धड़कनों को नाप-तोल रही थी.
देखके जिनको नींद उड़ जाए वो मतवाली आँखे हैं.
इस आकर्षक स्वप्न को सुनाने के बाद उस सज्जन ने बताया कि
वह बाथरूम में भी नहीं गाता है. गाना उसे आता ही नहीं.
नए फिल्म और नए गाने ही उसे पसंद आते हैं, फिर भी जाने क्यों ये दो पंक्ति उसे आज भी याद है.
उसने बताया कि स्वप्न लगभग 10 वर्ष पुरानी है. स्वप्न अक्सर देखता है लेकिन जागते ही उसे कुछ याद नहीं रहता.
नेहरू पार्क को बाहर से तो देखा था, अंदर से नहीं. अलबत्ता इस स्वप्न के बाद एकबार पार्क के अंदर यूँ सैर किया, जैसे बहुत जरूरी हो.
स्वप्न शादी से पहले देखा था, पत्नी उसकी खूबसूरती के सामने कुछ भी नहीं है, यह भी सज्जन ने बेहिचक बताया.
No comments:
Post a Comment